ॐ तत्सत
प्रत्यभिज्ञा — स्वयं की पहचान
That which is eternal, beyond time – and already within you.
“प्रत्यभिज्ञा” शब्द का अर्थ है — स्वयं को पहचानना, उस सत्य को पहचानना जो
था, है और सदा रहेगा — जो कालातीत, अविनाशी और अखण्ड है।
ईश्वर, भगवान, परमेश्वर — ये सभी शब्द उसी अनादि, अनन्त, जन्म-मृत्यु से परे चैतन्य के लिए प्रयुक्त होते हैं।
वही चैतन्य हमारा वास्तविक आधार है, और हम सभी उसी के अंश —
उसके सूक्ष्म प्रतिबिंब, उसके जीवंत कण हैं।
जीवन का वास्तविक उद्देश्य
जीवन का उद्देश्य
अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव —
जो आनन्द, ज्ञान और अमृत से पूर्ण है —
यही जीवन का परम उद्देश्य है।
वेदों का संदेश
“आत्मकल्याणं एव कर्तव्यं”
मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र और शत्रु है।
सच्चा आनन्द केवल आत्मदर्शन में है।
आंतरिक सत्य
हम बाहर खोजते हैं,
जबकि सत्य भीतर है।
स्वयं को जानना ही परम शांति का मार्ग है।
क्यों कठिन है स्व-ज्ञान?
आज का जीवन बाह्य आकर्षणों से भरा हुआ है। इन्द्रियों के विषय मन को सहज ही अपनी ओर खींच लेते हैं और
मनुष्य को बहिर्मुख बना देते हैं।
जब मन लगातार बाह्य विषयों में उलझा रहता है, तो वह अपने ही स्वरूप को देख नहीं पाता — उसे पहचान नहीं पाता। हम सब ध्यान करते हैं — परन्तु अधिकांशतः वह ध्यान बाहरी वस्तुओं का होता है, न कि अपने भीतर के चैतन्य का।
इन्द्रियों से हटकर, मन को धीरे-धीरे
स्वात्म चिंतन की ओर ले जाना ही साधना है। और यह यात्रा सरल हो जाती है — जब एक सच्चा मार्गदर्शक उपलब्ध हो।
क्यों कठिन है स्व-ज्ञान?
शास्त्र अध्ययन
गहन अध्ययन, साधना एवं अनुप्रयोगपूर्वक अध्ययन
- विज्ञान भैरव तंत्र (112 ध्यान विधियाँ)
- सौंदर्य लहरी आदि शंकराचार्य कृत
- प्रत्यभिज्ञा हृदयम्
- ईश्वर प्रत्यभिज्ञा दर्शनम्
- शैव एवं शाक्त दर्शन के सिद्धांत
हमारा उद्देश्य
इस दिव्य ज्ञान को सभी तक पहुँचाना ही हमारा एकमात्र उद्देश्य है।
- इस आधिकारिक वेबसाइट का निर्माण
- प्रत्यभिज्ञा दर्शन आश्रम एप्लीकेशन
- सर्वसामान्य के लिए ज्ञान को उपलब्ध कराना
- हर साधक तक दिव्य ज्ञान की पहुँच
“स्वयं को जानना ही सबसे बड़ा ज्ञान है। यही मुक्ति का मार्ग है।”
ॐ तत्सत
